मुझे तुम्हारी यादों का

                

                       


मुझे तुम्हारी यादों का

हर रूप सुहाना लगता है,

जीवन के रंगों-रेशों का

हर रूख रूहाना लगता है;

गहरे राग-विरागों का

यह मूल पुराना लगता है,

जीवन के सुंदर सर्गों का

यह मुख-मुहाना लगता है ।


मन यहाँ मिले, तन वहाँ मिले,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मन यहाँ रमे, तन वहाँ रमे,

कुछ यहाँ मिले, कुछ वहाँ मिले,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का 

हर रूप सुहाना लगता है।


आँखों-ओठों का यह विस्मय

कुछ सपना-सपना लगता है,

कुंचित केशों का यह संचय

कुछ अपना-अपना लगता है ।


विंध्य से चलती वातों-अलकों से

हिमपति का उन्नत शीश मिले,

मेघों की साँसों में बहके-बहते,

हम साथ उठे गिरे, हम साथ गिरे,

पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण

सब साथ मिले, सब साथ जुले,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का 

हर रूप सुहाना लगता है।


सब मूलों में, सब फुनगी में,

सब डालों में, सब शाख़ों में,

सब शालों में, सब छालों में,

सब पत्तों में, सब फूलों में,

सब द्रुमों में, सब दामों में, 

कलियों के गुंफित बंधों में,

कोंपलों के सार-प्रसारों में,

कसे-बँधे, उभरे-उमगे

जीवन-लय-वलयों में,

संचित, सिंचित, सुरभित,

सुलगे सुचयों में,

सोचते-बोलते, ठहरे-गहरे,

रूकते-बहते छंद मिले,

झुकते झरने, झनझन झंझा, झेलम-झकझोर मिले,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का

हर रूप सुहाना लगता है।


सब रोमों में, सब स्पर्शों में,

हर कंपन में, हर स्पंदन में,

हर छुअन में, हर चुंबन में,

हर आलिंगन में, हर आलोड़न में,

हर सिहरन में, हर संकुचन में,

हर सुषमा-उष्मा-संप्रेषण में,

जीवन के चेतन चिन्ह मिले,

जीवन के चलते चित्र मिले,

जीवन के तैरते तत्व मिले,

जीवन के सच्चे सत्व मिले,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का 

हर रूप सुहाना लगता है।


सब नोकों में, सब झोंकों में,

सब तापों में, सब शापों में,

आँखों के तपते वाणों में,

जिह्वा के लपलपाते चिंतन में,

शब्दों से भूषित भंजन में,

हर खंडन में, हर मंडन में,

जीवन के भास-आभास मिले,

जीवन के भासित भाष्य मिले,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का 

हर रूप सुहाना लगता है ।


हर निगम में, हर आगम में,

सब कर्मों में, सब धर्मों में,

सब रवों में, सब रोरों में,

सब कोरों में, सब पोरों में,

हम साथ रमे, हम साथ रहे,

हम साथ बसे, हम साथ बढ़े,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का

हर रूप सुहाना लगता है।


कुछ साँझ झँपे, कुछ सुबह उठे,

कुछ अमा चढ़े, कुछ समा बँधे,

अँधेरों की प्रथा-कथा में,

उजालों के उत्सर्गों -उल्लासों में,

हम साथ मिले, हम साथ घुले,

हम साथ मिटे, हम साथ जले,

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का

हर रूप सुहाना लगता है।


हर आती-जाती, जलती-तपती,

मिलती-मिटती, बाती-थाती में,

हम साथ रहे, हम साथ रसे,

हम साथ लहे, हम साथ लसे

कुछ ऐसा-ऐसा लगता है,

मुझे तुम्हारी यादों का

हर रूप सुहाना लगता है। 



                          - सतीश 

                             3 Dec, 2017 /30 Dec, 2017

                             Oklahoma City, OK

                              /Union City, CA. 





                             


             










टिप्पणियाँ

  1. सूंदर और स्मर्णीय कविता। जोरदार अभियक्ति, बिलकुल नोक पर

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