मकर-संक्रांति
मकर-संक्रांति के पावन पर्व पर
सूरज की किरणों को सीधे-सीधे मन में उतरने दो,
कुहरा-कुहासा-कलुष छँटने दो,
गहरी, बँधी, जड़ गाँठों को,
धीरे-धीरे ही सही, खुलने-उघड़ने दो!
कल तक जो सर्द था,
अब उसे नई पावन ऊष्मा से,
थोड़ा-थोड़ा ही सही,
पिघलने-मिटने दो!
तब जाकर जीवन का एक
सार्थक वसंत आयेगा -
नये रंग-उमंग, नये सौंदर्य के साथ,
नई छवि, नई भाव-भाषा के साथ,
सुंदर नियत, सुंदर भव-नियति के साथ!
फिर, प्रसन्नचित्त होकर
माँ सरस्वती
वसंत-पंचमी को साथ लिए
जग-जीवन में
विद्या-कला-गुण-सुर-संगीत के
पुनीत आशीष भर देंगी।
- सतीश,
मकर-संक्रांति, 14 Jan, 2021.
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