मेरे भारत
सृष्टि-सृजन का प्रथम नाद,
मानवता की आदि कथा,
सभ्यता-संस्कृति का सुंदरतम बहाव,
धर्म की श्रेष्ठतम ध्वजा, महान्;
सत्धर्म-निरत, सत्कर्म-रत,
भारती-सुर, वेद-स्वर,
मेरे भारत, तुम दीप्त भास्वर,
सतेज, सहृदय, शालीन शीर्ष!
क्यारी-क्यारी,फाँकों-खाँचों,
ख़ेमे-खंडों को पाट-पाट कर,
अपयश-अपमानों को पी-पी कर
मेरे भारत, तुमने सदैव उन्नत
मानवता को मन-मान दिया!
जीवन में सीधे पैठ-पैठ कर,
वेद-उपनिषदों का अनुसंधान कर,
योग-धर्म का संधान कर,
निगम-आगम, निवृत्ति-प्रवृत्ति
को साथ समेट, बाँध-बाँध कर,
मेरे भारत, तुमने जीवनमय, अमोल
अध्यात्म का गहरे अवगाहन किया!
विविध रीति-रिवाज-रस्मों,
धर्म-मर्म, बोली-भाषा-संवादों,
कृति-प्रकृति, ऋतु-मनुहारों को
भूगोल-इतिहास में समेट-सहेज कर,
मेरे भारत, तुमने पूरे जग को
सनातन सार-तत्व, प्राण-प्रसार दिया!
-सतीश
30 Jan, 2021.
Very nicely written Satishji!
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