वह आग

आग जो कभी सुलगी थी, 

वो आज भी जलती है,

कभी मद्धिम,कभी तीक्ष्ण तेवर में,

वो आज भी धधकती है।


वह लहक, उस लौ की वह लचक,

मन में अब भी बहकती है,

समय-दूरियों को पाटती, 

ठहरती-डोलती, 

वह गुदगुदाती-गुनगुनाती है,

आग-राग बनकर, 

उष्ण नाद बनकर,

आदि-अनादि, अमित,

अमिय संवाद बनकर।



        -सतीश 

        9 Jan, 2021

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