चिनगारी
मानता हूँ,
गहन अँधेरे की वेला है,
दुख की जकड़
पीड़क, भयानक है।
पर, अंतत:, मनुष्य की शक्ति,
मनुष्यता की अभिव्यक्ति,
सुसंयोग की नियति
उससे भी बड़ी,
उससे भी सघन है।
रात चाहे जितनी भी अँधेरी हो,
छोटी ही सही, पतली ही सही,
तनिक ही सही, मद्धिम ही सही,
एक चिनगारी आशा तो जगाती है,
तम के सीने पर लहक कर -
अमंद, अनश्वर, अप्रतिहत
जाग-जाग कर, हिल-डुल कर ।
आइये, हम वह चिनगारी ढूँढते रहें,
वह चिनगारी बनते रहें।
- सतीश
25 April, 2021.
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