शरद पूर्णिमा का चाँद!

कहते हैं,

शरद पूर्णिमा का चाँद

सोलहों कलाओं से पूर्ण होता है;

सोलहों कलाएँ! 

कलाएँ  जिनकी चाँदनी 

आकाश से गलबाहियाँ-ठिठोलियाँ 

करती रहती है;

चारों ओर घूम-घूम कर,

इतराकर-इठलाकर, 

अपने तन-मन में तन्मय होकर,

अपने आप को सजाती, निहारती,

धवल करती रहती है।


पर, ऐ चाँद, 

एक छोटी-सी बात तुम भूल गये 

कि आकाश से सटे रहने की कोशिशों में 

कभी-कभी तुम पूरे होते हो,

कभी कटे-कटे, कभी आधे, 

कभी अधूरे होते हो! 


अच्छा होता, 

यदि तुम धरती के पास उतर जाते,

हर मन में बैठ जाते,

थोड़ी देर के लिए भी अटक जाते, 

धरा की धूल, धुँआ से खेलते-हँसते

उजल जाते, 

कुछ क्यारियों को अपनी रौशनी से पाट देते, 

वसुधा को तुम्हारी 

अमिय-प्राणमयी चाँदनी मिल जाती! 


ऐसे में, सचमुच, तुम पूर्ण हो जाते

एक बार के लिए नहीं -

हर दिन, हर रात के लिए,

हर भोर, हर साँझ के लिए,

हर माह, हर ऋतु के लिए,

हर घर, हर मन के लिए!

तुम पूर्णतर होते जाते

तुम पूर्णतम हो जाते! 

और, तब, शरद का होना 

कुछ और स्पष्ट, 

कुछ और स्वच्छ हो जाता! 


सतीश

     Oct 22, 2021. 


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