सुबह-सुबह यह सूरज

किस तप में तप-तप कर,

किस मन में खिल-खिल कर,

किस भाव-क्षितिज से उठ-उठ कर,

किस स्नेह-मर्म से सना हुआ 

सुबह-सुबह 

यह सूरज स्वर्ण-दीप्त हुआ।


किन बातों में टहल-टहल कर,

किन यादों में सरक-सरक कर,

किस आस-साँस को थाम-थाम कर,

किस राग-ज्वाला में जल-जल कर

यह सूरज स्वर्ण-दीप्त हुआ।


किस छुअन से ख़ुश-ख़ुश होकर,

किस स्पंदन में सिहर-सिहर कर,

किन तृण-तरुओं को ताक-ताक कर,

किस भावना को परख-परख कर,

किस सोच-मुद्रा में ठहर-ठहर कर,

किन सौन्दर्य-रेखाओं पर फिसल-फिसल कर,

किस कला-साँचे में ढल-ढल कर,

यह सूरज स्वर्ण-दीप्त हुआ! 


किस वेदना में लहक-लहक कर,

किस संघर्ष में सुलग-सुलग कर,

किन सर्द सलूकों को सह-सह कर,

किन तम-तोमों से जूझ-जूझ कर,

किन जीवन-तंतुओं पर बैठ-बैठ कर,

किस मर्यादा पर चढ़-चढ़ कर,

किस स्वप्न- बोध को सँजो-सँजो कर,

किस उष्मा-ऊर्जा में पैठ-पैठ कर,

यह सूरज स्वर्ण-दीप्त हुआ! 


      - सतीश

          6 Feb, 2021. 

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