ऐ बादल
दूर-दूर तक हाँफते हुए,
बेचैन—विचल भटकते हुए,
तू किस प्रकृति-प्रक्रम में भूला है?
तू पूछ, मानसरोवर के शिव-ह्रदय से,
हर हर बम के सात्विक नादों से,
उन्नत धामों की उच्च गुफाओं से,
उनके स्पष्ट साधना-स्वरों से;
धरती की भीषण आवश्यकताएँ हैं टोह रही,
मर्यादाएँ हैं टोक रही, समाजी
बिजलियाँ तेरे ह्रदय को टटोल रही,
वे कौंध रही, वे कड़क रही।
पर्वतों से मदहोश गलबाहियाँ छोड़ कर,
आकाशीय आडंबरों से अठखेलियाँ बंद कर,
तू जीवन का रस-तत्व समझ ले,
अस्तित्व का मूल्य-भार पढ़ ले।
शक्ति-ग्रंथि से विमुक्त होकर
खुले मन से, उद्वेगरहित होकर
ऐ बादल, तू चारों ओर बरस ले!
- सतीश
21st August, 2021.
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