श्रीकृष्ण
जीवन के स्याह-श्याम पक्षों को
श्रेष्ठ शील-साहचर्य देकर
तुम स्वयं ‘कृष्ण’ हो गये !
श्रृंगार को संस्कृति-श्री देकर
तुम उसे मोहनमय कर गये;
अपनी वंशी की धुन में
प्रेम और कर्तव्य का सार-संसार पिरो कर
तुम सृष्टि-सारथी बन गये;
जीवन-मरण, कर्म-उद्देश्य की
भाषा-परिभाषा के तत्व-गुण, परिधि रच कर
तुम सुगेय, साकार, निस्सीम ‘गीता’ बन गये;
जीवन-चक्र के सात्विक दर्शन को
सतेज बाँध कर, हे देव,
तुम ‘सुदर्शन’ बन गये!
-सतीश
जन्माष्टमी, 2021.
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