मेघ-मन
अंबर की छाती पर जैसे
मेघों का मन सरकता है,
अंबर के आलिंगन में जैसे
मेघों में रस भर जाता है;
पर्वतों के भालों पर जैसे
मेघों का मुख अलसाता है,
शृंगों के पुचकारों से जैसे
मेघों का स्पर्श छहरता है;
घाटी की उष्मा से जैसे
मेघों का रक्त उमड़ता है,
खाईओं के बौराते वन से जैसे
मेघों का तन लिपटता है;
धरती की चाह-पुकारों से जैसे
मेघों का रोम तड़पता है,
धरती की मेड़-मरोड़ों पर जैसे
मेघों का शिरा-सिरा सिहरता है;
प्रकृति के झकोरों से जैसे
मेघों का अंग-उमंग चमकता है,
दामन से दामन मिलने पर
सृष्टि का वर्ण दमकता है;
अंबर से धरती तक मानो
सृष्टि का कर्म छहरता है,
चोटी से घाटी तक मानो
जीवन का पर्व लहकता है;
जीवन और उसे जीने का
मानो सुंदर सर्ग उमगता है।
⁃ सतीश
4th July, 2017.
बहुत सुन्दर ❤️💙
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