माँ

माँ, तेरी तपस्या को सँजो कर

 ग्रीष्म होता है जेठ-ज्येष्ठ ।


 तेरे सृजन-स्वप्न छहरते हैं,

 वर्षा की बूँदों-बूँदों में। 


तेरी नियत को थाह-थाम बन जाता है,

शरद-मन का आकाश  स्वच्छ-स्पष्ट।


तेरे कर्त्तव्य-बोध से विमुग्ध हो

हेमंत हो उठता है विनम्र-शीतल ।


तेरे व्यक्तित्व-शील के सम्मुख 

निष्प्राण हो शिशिर ठिठुरता है। 


तेरी मन-छवि को निहार-निहार कर

मिलते हैं वसंत को, सुंदर गात, श्रेष्ठ चरित्र ।


    - सतीश 

  4th June, 2021. 





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