माँ के पास

जब-जब

एक सृजन-शक्ति तुंग शीर्ष पर होती है,

वह माँ के पास होती है,

जब-जब

संवेदनाएँ कर्म-धर्म के पुनीततम आयाम को छूती हैं,

वे माँ के पास होती हैं।


जब-जब

जीवन के ख़ाँचों-फाँकों को पाटता हूँ,

पाटता रहता हूँ,

जब-जब

संदर्भ-उद्देश्यों को विशद-पुनीत बनाता हूँ,

बनाता रहता हूँ,

मैं माँ के पास होता हूँ।


जब-जब

नन्हें-नन्हें बिम्बों में 

जीवन के ऊँचे कर्तव्य-बोध धरता हूँ,

धरता रहता हूँ,

जब-जब

छोटे-छोटे प्रयासों में

बड़ी-बड़ी आसें, बड़े-बड़े स्वप्न भरता हूँ,

भरता रहता हूँ,

मैं माँ के पास होता हूँ।


जब-जब

अँधियारों के बीचों-बीच

उजालों के वृत्त बनाने की कोशिश करता हूँ,

करता रहता हूँ,

जब-जब

विपरीत परिस्थितियों को टटोलता हुआ

उम्मीदों की लकीरें खींचता  हूँ,

खींचता रहता हूँ,

मैं माँ के पास होता हूँ। 


-सतीश 

9th May, 2021. 




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