चाहता हूँ
चाहता हूँ,
कर्म की रेखाएँ बनता, बनाता रहूँ,
और, अपने आप को जताता रहूँ कि
कला-शिल्पों के लिए,
कविताओं-कहानियों के लिए,
फूलों-परागों की बाँहों पर
अलसाने की बारी ख़त्म हुई,
उन्हें सीधे-सीधे
जीवन की धूप में तपने-जलने-धधकने दो।
चाहता हूँ,
एक आलोड़न बनता रहूँ,
और, याद दिलाता रहूँ कि
शासन-प्रशासन के नायकों,
व्यवस्था के अंग-प्रत्यंग-यंत्र-तंत्र के
अहंकार-दम्भ के पुतलों,
भरी दोपहरी में अंधेरा छाया है,
तुम्हें नहीं ऊँघने-सुस्ताने दूँगा।
चाहता हूँ,
एक खटखटाहट बनता रहूँ,
और, बताता रहूँ कि
सत्ता-व्यवस्था के मुँडेरों पर बैठे
खाये-अघाये कबूतरों की चंचल चंचुओं की
नुकीली पैनी नोकों को
धरती की बेचैनी-बौखलाहट को चुगने दो,
उनके शालीन-से लगते पंजों को
धरती की तपतपाहट पर सरकने दो।
-सतीश
9th May, 2021.
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