शब्द-भंगिमा
जो अपनी सोच में
अग-जग को साथ बाँधे चले,
वह ‘सजग’ है;
विचारों-भावों के विविध वर्णों को
परस्पर सहने, और फिर
संयुक्त रहने का मनोयोग
सबों के लिए
अर्थ-भरा ‘सहयोग’ है;
सम-विषम को अपने प्रसार में
समेटे रहना, सँजोये रखना
सच्चे सत्व का
‘सार-संसार’ है!
बहुधा ‘प्रयोग’ में योग होते हैं।
छोटे-बड़े संयोग , संभव है,
कर्मयोग-बल से प्रेरित-मुदित होते हैं!
प्रसंग के संग-संग आकर ही तथ्यों के
असली तत्व दिखते हैं।
सच्ची आलोचना में, स्वभाववश,
लोच बसी होती है!
- सतीश
25 March, 2021.
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