बेटी

बेटी संतति ही नहीं,

संस्कृति होती है;

वह सभ्यता का सचेतन तट होती है।


वह माँ शारदा की वीणा, वादन होती है,

माँ दुर्गा की शक्ति-पीठिका होती है।

वह उषा की संकल्प-दृढ़ कांति,

चाँद की शीतलता, रागिनी होती है। 


वह समय-समय पर 

तर्क-वितर्क, ज़िद की पिटारी होती है।

वह युग-युगों से बनती-बहती,

दादी-नानी, माँ-बहन, पत्नी की संचित 

परम्परा-निधि की अगली छवि होती है। 


वह स्वप्न का तेज, तरल,

सुदीप्त प्लावन होती है,

लेख्य-अलेख्य, निर्बन्ध कल्पना होती है!


बेटी, 

युग-युगों के अविरल संघर्ष की कथा मनोहर,

नयी आयी भोर की धवल धूप, 

जीवन का सुंदर, रक्ताभ सार होती है;

जीवन की रूकी प्रवृत्तियों को,

थकी परम्पराओं, झुकी मनोवृत्तियों को,

कहीं अटकी, उदास मानवता को

नित्य नूतन, चेतन, प्रसन्न गति और प्रसार देती 

प्रकृति का सिद्ध संसार होती है! 



-सतीश 

Oct 2, 2021 &

Sep 25, 2022. 



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