एक भोली आस लिए

     

एक भोली आस लिए,

जीवन-अर्थों को साँस दिए,

कुछ देख रही, कुछ बोध रही,

कुछ हिगरा रही, कुछ खोज रही,

कुछ साध रही, कुछ बाँध रही,

कुछ पढ़ रही, कुछ पढ़ा रही,

कुछ कहती-सी, कुछ अनकही-सी,

आँखों में विश्वास-भरे विस्मय को धारे,

एक मर्म-सिक्त, मन-मुक्त हँसी! 


 - सतीश 

 19 May, 2021. 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आतंकवाद की शैली

बहुत बार

तुम, भोर के विन्यास सी!