संदेश

नवंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सूरज और दीप-ज्योति

 सूरज,  तुम आते हो बड़े क्षितिज पर, आसमान में हो उठते-चढ़ते !  पर, मैं बैठती हूँ धरती पर, छोटे-से-छोटे द्वार, देहरी पर,  अट्टालिकाओं से झोपड़ियों तक,  मान्य से सामान्य तक,  जलती हूँ, उजलती  हूँ। मुझे प्राची-पश्चिम का भेद नहीं, उत्तर-दक्षिण का ज्ञान नहीं;  कोई अतिशय ताप नहीं, तिलमिलाहट, तपतपाहट नहीं ; भोर हो, या साँझ,  दिन हो या रात, मैं जलती ही रहती हूँ।  अँधेरों से मैं नहीं छिपती, उनसे मुँह कभी नहीं मोड़ती; अमा का व्यक्तित्व  चाहे जितना भी घना हो,  मैं उसकी छाती पर  जलना नहीं भूलती!  तुमको हिचक होगी  मुझ तक आने में, पर, तुम चाहे जिधर रहो, मैं पूजा की थाली में,  तेरी वेदी तक आती हूँ!  अपनी माटी, अपनी बत्ती पर टिककर अपनी अस्मिता का बोध लिए, सभ्यता-संस्कृति की  अपरिमित, अमिय, अप्रतिहत आभा लिए  शिवरूपा, सुंदररूपा, सत्यरूपा,  मैं उज्ज्वलता की बाला हूँ; दीपों से दीपों को सजाती, मैं दीप-श्रृंखला, दीपों की माला हूँ; जीवन की गति और विराम को राममय, रामलय करती मैं दीपावली हूँ! हे सूर्य-देव, मेरे अस...

वे कहते हैं!

वे कहते हैं, - दीप न जलाओ, वे कहते हैं,- पटाखा न छोड़ो! और, भले-भोले, तुम, यों, “हरा-भरा” हो जाओ!   “पर्यावरण” का ऐसा वरण,   एक विचित्र आवरण है!   यह पर्यावरण का अतिशय प्रेम है?   या, हमारे स्व और स्वत्व का,   संस्कृति की भाव-भंगिमाओं का,   परम्पराओं की निष्ठाओं का,   परिपाटियों की अभिव्यक्ति का,    धर्म की मान्यताओं का     अति परिचित, सुनियोजित हरण है?  वे कहते हैं - मत जानो, तुम कौन थे, मत पहचानो, तुम कौन हो, मत सोचो, तुम कौन होगे!  वे कहते हैं - अरे भाई, तुम ‘मूल’ नहीं,  “क़ाफ़िला” हो;  तुम “असभ्य” थे, तुम्हें “सभ्य” बनाने  बेचैन, बड़े दिल वाली  संस्कृतियाँ आयीं , “मानवता” की पवित्र पोथियाँ ले-लेकर! वे कहते हैं -  “धर्म अफ़ीम है”!  फिर, व्यग्र होकर हमें बताते-जताते हैं कि एक ‘विशेष धर्म’ ही अफ़ीम है, वह नाहक असम-विषम है!  और, वे अशेष रूप से  सम, समता के वाहक हैं!  वे कहते हैं-  “म” से माँ न कहना, भारत माँ तो कभी न कहना! कह सको तो, म से  केवल “मार्क्स” कहना...