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सच कहूँ?
तुम शरीर नहीं,
आत्मा हो गई!
तेरे वर्ण, अक्षर, शब्द
से होकर
करूणा के कलेजे,
वेदनाओं के सर्ग-सन्दर्भ,
हँसी और दुख के तन-मन,
भावों के अपरिमित आयतन,
प्रेम-घृणा की असंख्य परतों,
आस-प्यास-साँस,
रास-लास-मधुमास,
रंग-तरंग, सकल उल्लास,
राग-विराग, हास-परिहास,
उद्वेग-द्वंद्व की पकड़-जकड़,
मन-ज्ञान, आत्मा की बुदबुदाहट को
मैंने समझना, नापना, भाँपना सीखा!
तुम कभी गुदगुदी,
कभी कचोट,
कभी चोट की अनुभूति,
कभी प्रेरणा हो गई!
पेट-पेशे, आहार-व्यापार
की दिन-रात की
आवश्यकता, औपचारिकता से दूर
तेरी उँगलियों को धरकर
पर्वतों पर चढ़ना-उतरना, फिसलना-सँभलना,
सागर की परतों में पैठना-धँसना,
धरती की धूल-धूम,
बादलों की नियत और नियति,
जीवन की रेत,
यहाँ-वहाँ उचित-अनुचित वर्षण को
देखना-पहचानना सीखा!
तुम जीवन का आरम्भ,
फिर, आवश्यकता हो गई!
तेरी वर्तनी में
मुक्त-उन्मुक्त, खुली भोर,
साँझ के सिमटे मन,
रात के चेहरे-चरित्र को
पढ़ना, उनसे होकर गुजरना सीखा!
शरद-शीत की भाषा,
हेमंत-वसंत की अभिव्यक्ति,
ग्रीष्म-वर्षा की अमित, अतुलित पहचानों को
धरना, धारना सीखा!
तुम देव-स्थली,
पूजा-वन्दना,
कविता-कथा, कला,
फिर, उन सबों से उठकर
कर्म-धर्म, स्वयं ही
जीवन-तन-सनातन हो गई!
⁃ सतीश
1st January, 2022.
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