शांति-युद्ध के जादूगर

एक बात तो फिर लौट कर आयी 

कि शांति की बड़ी, सुनहरी पहेलियों के पीछे 

बैठे होते हैं, युद्ध के निपुण बाज, कलाबाज़! 

ऐसा भी होता है कि

शांति के दुभाषिये युद्ध की भाषा गढ़ते हैं,

उसका मान्य व्याकरण बनाते हैं!


“प्रजातंत्र” और “विश्व-हित” के 

सुसंस्कृत कबूतरों की शालीन फड़फड़ाहटों में 

सुनाई पड़ती हैं उन्मादी युद्ध की भयानक आहटें! 

और, मोहक, गोरी अवधारणों में,

आकलनों-विवरणों-विश्लेषणों में व्यस्त हो जाते हैं,

जग-स्वतंत्रता के विशद स्तम्भ!


औरों की जीवन-बलि से,

अन्यों के कंधों पर टिकी चिताओं पर 

सजती हैं विश्व-नायकों की बेतरतीब कुंठाएँ;

दूसरों के रक्त से सन कर गाढ़ी होती हैं,

विश्व-पुरोधाओं, प्रणेताओं की असीमित आसक्तियाँ! 


ठगी वही नहीं जो 

इतिहास-भूगोल की चौहद्दी को नकारती है,

बल्कि, वह भी है जो

शांति के सूत्रों, शास्त्रों, संगीतों के साथ 

तरह-तरह के आश्वासन बुन कर,

विश्वास के बेडौल कवच ओढ़ाकर,

घृणित स्वार्थों, लहुलूहान सत्ता-समीकरणों के लिए

हमको और आपको, मित्रों-सहयोगियों को 

युद्ध-ज्वाला में धकेल देती है;

और, स्वयं निश्चिंत बनी रहती है,

अग-जग को सांत्वनाओं का

मदिर आसव पिला-पिला कर! 


यों सौंपते हैं पूरे संसार को 

शांति के वरदान का नाद;

यों ही होते हैं मान्य, 

स्वघोषित रूप से धन्य,

शांति-युद्ध के ये जादूगर! 


सतीश 

March 5, 2022. 




























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