श्रीराम
अयोध्या के रग-रग में
जीवन-सर्ग तुम्हारा बसता है,
अयोध्या के रंगों-रेशों में
उत्सर्ग तुम्हारा बसता है,
भारत-भूमि के कण-कण में
मन-प्राण तुम्हारा रहता है।
तेरे कर्म-धर्म के शिल्पों में
संस्कार तुम्हारा रहता है,
तेरे रूप-स्वरूप की छाया में
संस्कृति हमारी पलती है।
तेरे धनुष की डोरी पर
सृजन-कृति-प्रकृति ठहरती है,
तेरे वाणों की भाषा में
मर्यादा ऊपर चढ़ती है!
माता सीता की जीवन-छाया में
शील-मर्यादा तेरी बढ़ती है,
शबरी के जूठे बेरों में
प्रेम-मान तुम्हारा बसता है,
सुग्रीव के व्यवहारों में
मित्र-भाव तुम्हारा रहता है,
संबंधों की ग्रीवा तनी रहे
भाव ऐसा जगता है!
संकटमोचन की लाई जड़ी-बूटी में
अमिय-अजर शक्ति तुम्हारी बस्ती है,
रामेश्वरम् के संकल्प-छंद तेरे बोलते है,
पत्थर-पत्थर के पावन प्लावन में
आशीष तुम्हारे तैरते हैं!
तेरे चरणों की आकृति में
भव-धाम हमारा बसता है,
तेरे चरणों के रज-कण में
परित्राण हमारा रहता है,
तेरे नाम के उच्चारण में
अग-जग निनादित होता है!
सतीश
⁃ August 4, 2020
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