प्रकृति को याद है
राग-अनुराग समेटते-समेटते रात बीती,
यादों में अटकी चाँदनी की आहटें,
आकाश के शरीर पर चपल चाँद की सस्मित सरसराहटें,
कुछ साँस-धड़कनें, भाव-भंगिमाएँ, हलचल-हरकतें-
सुबह में प्रकृति को याद है, अब भी, रात की बातें!
बातें,
जो क्षितिज को स्वर्ण-आभा पहनातीं,
प्राची को प्रेम-स्पन्दन से भरतीं,
ताजगी के तारों को मुखरित करतीं,
फिर, तिरछी-सीधी किरणें हवाओं से टकरातीं,
फुदकती, फहरती, फैलती, उष्णता उड़ेलतीं!
सुबह में प्रकृति को याद है रात की बातें !
बातें,
जो कोपलों को उकसातीं
तनाओं को प्रेमिल परत से ढँकतीं,
हरी-हरी पत्तियों की पतली-पतली
धमनियों को प्रेम-लकीरें सौंपतीं,
कलियों के ह्रदय-आवरण खोलतीं,
कोमल पँखुड़ियों में लज्जा भरतीं,
फूलों के मन को उमगातीं,
पराग-कणों को राग-विभोर करतीं,
हवाओं को सुंदर मर्म से हिलातीं-डुलातीं!
लाल-लाल चेहरा लिए नभ की नसों में
दौड़ती खगों की चहचहाहटें!
सौंदर्य-सुहाग से दमकती,
लोल-ललित, मुदित, विस्मित होती सुबह!
सुबह में प्रकृति को याद है, अब भी, रात की बातें!
- सतीश
Oct 30, 2020.
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