परम्परा

परम्परा के परों की उड़ानें बड़ी होती हैं!

उसके विशद अर्थ और सुंदर बोध

नाहक, निरर्थक अवरोध नहीं बनते,

बल्कि, सभ्यता-संस्कृति की सार्थक गति,

धवल प्रेरणा, युगों की संचित ऊर्जा,

भविष्य के ऊँचे, मानक संकेत होते हैं! 


आधुनिकता की अति अधीरता, 

आतुर आपाधापी में भी

परम्परा के समुद्र में पैठते रहना,

गहरे गोते लगाते रहना,

हेय नहीं, अवांछनीय नहीं, त्याज्य नहीं! 

बल्कि, एक सहज जीवन-धर्म है! 


समुद्र, आसमान और हवा 

परम्परा नहीं हैं? 

उनके व्यक्तित्व, उनके चित्त, चरित्र

परम्परा के मानक अवयव नहीं हैं? 

सही-सच्चे अर्थों में, वे 

पुरातन हैं, सनातन हैं, आधुनिक, अत्याधुनिक भी! 


सतीश 

12 August/27 August, 2022. 

(Union City/ Pismo Beach, California)







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