राजनीति से पलायन
राजनीति से पलायन,
एक विशुद्ध ढोंग है, छबीला छल है;
हम सबों का, विशेषकर, तथाकथित
पढ़े-लिखे लोगों का एक सजीव पाप है! -
समाज के प्रति, व्यवस्था के प्रति,
देश, देश-कर्म के प्रति,
विश्व और विश्व-बोध के प्रति!
सत्ता के गलियारों में, मुँडेरों, डेरों पर
अपराधी, चोर, उचक्के, घोटालेबाज़
यदि उपस्थित हैं, आसीन हैं, तो,
इसके लिए हम सभी उत्तरदायी हैं! -
व्यक्ति की भूमिका में, समाज की भूमि पर!
जीवन का कोई क्षेत्र नहीं, कोई अंग नहीं,
जिससे होकर राजनीति गुजरती नहीं;
फिर, हम इससे ऊपर उठने का छद्म-भाव
क्यों पाले रहते हैं? क्यों ओढ़े रहते हैं?
क्यों पलायन को प्रबुद्ध, शुद्ध बताते रहते हैं?
अपने आप को विशेष, अशेष जताते रहते हैं?
एक सीमा के बाद, राजनीति से तथाकथित दूरी
हर तर्क, हर बहस को,
हर कविता-कहानी-कला को
अघोषित आलाप-विलाप बना देती है,
भ्रांत पथ की अंतहीन यात्रा पर भेज देती है!
⁃ सतीश
22 August, 2022.
1.03 PM.
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