भोर से रात तक

  भोर से रात तक

  - - 

उसने क्षितिज को चूमा,

वह निहाल, प्रसन्न हो गई,

खिल कर चारों ओर फैल गई,

वह स्वयं लाल-लाल हो गई,

भोर हो गई! 


चतुर्दिक, कलरव, भविष्य के सुंदर रव चहकने लगे,

वह सचेतन तप से जल उठी, 

उजली हो गई। 


वह दिन भर जलती रही,

दिन भर उजलती रही! 


वह सार, संसार, प्रसार हो गई! 


उसने विराम लिया,

वह शाम हो गई, अभिराम हो गई,

कुछ राम, कुछ श्याम हो गई,

राममय, श्याममय हो गई। 


कुछ देर बाद,

लोगों ने कहा, देखो, वह रात हो गई;

सच है, लगा कि 

जीवन के भिन्न-भिन्न पहर को पार कर 

निरंतर छहर कर, लहर, पसर कर 

नैसर्गिक प्रकिया में

वह एक गहरी, बड़ी बिसात हो गई! 



यों, भोर से रात तक,

वह प्रकृति, प्रकृति की कृति,

कृति की प्रकृति, 

कृति की यात्रा, महायात्रा हो गई-

सदेह, विदेह,

निर्विष, निर्विकार,

सशब्द, नि:शब्द! 


- सतीश 

Sep 3, 2022. 






टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आतंकवाद की शैली

बहुत बार

तुम, भोर के विन्यास सी!