वसंत - - - - माघ के शुक्ल-पक्ष की पंचमी को होती है माँ सरस्वती की पूजा! माँ, तुम्हारे आशीष के राग से फूलों के पराग मचलने लगते हैं, तुम्हारी विद्या-वादन-चेतना से पत्तों के हरे-भरे रंग-वेश-मन-तेज दूर-दूर तक पसरने, बहने, विहरने लगते हैं। सुंदर संभावनाओं के सुर सुन-सुन कर आत्म-विश्वास से भर-भर कर कोंपल नये संसार में आने को आकुल हो जाते हैं। माँ, तुम्हारी वंदना के स्वर से गगन शुभ्र, शुभ्रतर होने में मग्न हो जाता है, धरती नयी बिसात से फूलने-फलने लगती है, वन-उपवन आमोद-विभोर हो जाते हैं, आम-वृक्ष मंजरी पाकर धन्य हो जाते हैं, टेसू मन से खिलने-मुस्काने लगता है, सरसों के फूल सौंदर्य-बोध से पीले-पीले हो जाते हैं। माँ, तुम्हारी आराधना की विवेक-शक्ति, श्रद्धा-निष्ठा से मौसम का धर्म विस्तृत हो जाता है; तुम्हारे कला-गुण को पाकर, पढ़ कर , गुन कर प्रकृति प्रसन्न, संपन्न, संत, मोहक वसंत हो जाती है! - सतीश 27 Feb, 2021
वे कहते हैं, - दीप न जलाओ, वे कहते हैं,- पटाखा न छोड़ो! और, भले-भोले, तुम, यों, “हरा-भरा” हो जाओ! “पर्यावरण” का ऐसा वरण, एक विचित्र आवरण है! यह पर्यावरण का अतिशय प्रेम है? या, हमारे स्व और स्वत्व का, संस्कृति की भाव-भंगिमाओं का, परम्पराओं की निष्ठाओं का, परिपाटियों की अभिव्यक्ति का, धर्म की मान्यताओं का अति परिचित, सुनियोजित हरण है? वे कहते हैं - मत जानो, तुम कौन थे, मत पहचानो, तुम कौन हो, मत सोचो, तुम कौन होगे! वे कहते हैं - अरे भाई, तुम ‘मूल’ नहीं, “क़ाफ़िला” हो; तुम “असभ्य” थे, तुम्हें “सभ्य” बनाने बेचैन, बड़े दिल वाली संस्कृतियाँ आयीं , “मानवता” की पवित्र पोथियाँ ले-लेकर! वे कहते हैं - “धर्म अफ़ीम है”! फिर, व्यग्र होकर हमें बताते-जताते हैं कि एक ‘विशेष धर्म’ ही अफ़ीम है, वह नाहक असम-विषम है! और, वे अशेष रूप से सम, समता के वाहक हैं! वे कहते हैं- “म” से माँ न कहना, भारत माँ तो कभी न कहना! कह सको तो, म से केवल “मार्क्स” कहना...
पाँच वर्ष की कमाई का मौसम है, सही-ग़लत देखना विषम है। सम-सम्यक् है, ज़हर फैलाना, कभी इधर,कभी उधर से,आग लगाना। यही राज है,यही नीति है, खादी से कलम तक की यही दारुण रीति है। सोचा था, खादी के श्रेष्ठ सूत के सुंदर तत्व कलमों में समा जायेंगे, फिर, कलमें बड़े भाव से आसक्त होकर बोलेंगी, देश-समाज की रिक्त भावनाओं को उच्च संभावनाओं से भरेंगी ! पर, खादी के वादे कहाँ गये? कलमों की क़समें कहाँ गईं? ऊँचे-ऊँचे सपनों के नारे, तेज-तर्रार, फुर्तीले, आदर्श-सिक्त मुहावरे, किस ओर मुड़े, किस ओर गिरे? किस ओर झुके, किस ओर ढले? कलमें अपना अस्तित्व भूल गईं, अपनी बोली, अपने तेवर, अपने रूप अपनी स्थापनाओं के आधार, अपनी छवियाँ भूल गईं। खादी और कलम की ऐसी एकता, उनका एकवर्णी, लयमय चरित्र प्रजातंत्र के बड़े अपराधों में एक है; प्रजातंत्र की अनेकताओं के बीच ठहरी यह गहरी शून्यता है! खादी वाले, तुम सूत-सूत को देश-प्रदेश, लोगों के स्व और जीवन-अर्थों से ऐसा बाँधो कि वही तुम्हारा “स्वार्थ” हो जाये! जग में कलम उठाने वालों! अपन...
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