“गिरना” !

चारों ओर, गिरने की होड़ लगी है;

गिरना पथ है, पायदान भी,

अपने आप में एक अभीष्ट लक्ष्य भी! 


समाज में, पत्रकारिता, राजनीति में, 

संस्थाओं, व्यवस्थाओं के रूपों, अपरूपों में,

साहित्य और कला में, 

उनकी मोहक-सी छवियों, भंगिमाओं में 

“गिरने” की अपनी-अपनी भाषाएँ-बोलियाँ हैं,

बहुआयामी उपजाऊ व्याकरण भी ! 


बहुत बार,

“गिरना” एक पुरस्कार है! 

एक सोची-समझी मानसिकता, 

एक सोद्देश्य व्यसन, 

एक लाभकारी उद्योग, 

एक सुनियोजित अभियान है! 


अब, 

गिरना मन के भीतरी स्तरों, तारों को 

टटोलता, टोहता हास्य नहीं,

कोई कचोटता व्यंग्य भी नहीं,

बल्कि, 

समय का एक दारुण तथ्य है,

चतुर्दिक फैला 

चेतना के अवसान का अंतहीन, करूण कथ्य है! 


- सतीश 

Nov 24, 2022. 


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