वह
वह एक स्वप्न थी,
कुछ ढँकी, कुछ खुली-सी!
वह आसमान को ताक रही थी,
शून्य को खोजती, स्वयं एक अपरिमित शून्य-सी।
अपने सिर को पुस्तकों पर टिकाये थी,
एक सभ्यता-सी, सभ्यता बनने की प्रक्रिया, प्रयास-सी।
वह सोच रही थी,
प्रकृति-सी, एक सुंदर कृति-सी।
वह लीन-विलीन थी,
एक अनजाने अवयव-सी, एक महती खोज-सी।
वह किसी ध्यान में थी,
कला की सुंदर बुनावट लिए एक परम ज्ञान-सी,
या चरम भक्ति-सी!
-सतीश
27 June, 2022.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें