पत्थर की भाषा
सचमुच, पत्थर भी हैं बोल रहे
सृष्टि की अद्भुत भाषा!
सुंदर संयोजन, निपुण नियोजन,
जीवन-अर्थों से भरा अवलोकन !
आपस में मिलकर पत्थर भी
कुछ शील-चित्र गढ़ लेते हैं,
चुप रहकर भी कुछ कह देते,
कहकर भी चुप रह जाते हैं!
बड़े निश्चिंत, सरल भाव से वे
विविध आकारों, आकृतियों को थामे
सकलता के स्वरूप और व्यक्तित्व की
पूर्णता, चेतनता सतत् जताते हैं,
भिन्न-भिन्न भंगिमाओं को धारे
जग-व्यवहार सजग बनाते हैं!
यही है प्रकृति का शाश्वत नियमन,
यही सहज गति और प्रेरक संवेदन!
- सतीश
Dec 28, 2022
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