अलास्का की शाम

जाते-जाते सूरज की किरणें 

पर्वत-शरीर पर निर्विकार चित्त से लेटी हैं;

भोले भावों से सिहर

विस्मय से भरे स्मित मन-तरंगों पर चढ़ के

विनोदपूर्ण अल्हड़ ओठों से वे 

पर्वत-भालों को बार-बार हैं चूम रहीं !


धीरे-धीरे किरणों का चुम्बन धीर हुआ जाता है,

जैसे मन की गहरी आँधी भी

सोच-विचार कर, सँभल-सँभल कर

या, आश्वस्त, निश्चिंत होकर 

अधीर अधरों तक आती हो! 


ग्लेशियर से होकर,

नीचे तल पर जल की निर्मल मन-धारा

शांतमना बहती जाती है,

उसके ह्रदय की स्वच्छ ध्वनि 

स्पष्ट सुनाई पड़ती है! 


सतीश 

Dec 31, 2022. 


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