एक शाम


बहुत दिनों के बाद

पहले की तरह 

 मैं घर वापस लौट रहा था।

बहुत-बहुत दिनों के बाद

मैं बादलों से बहुत-बहुत ऊपर था!


पश्चिम मेंअपने प्रारब्ध-प्रबोध से

सूरज उतरने की प्रकिया में था - 

अमाप-अमंदअव्याख्येय धुन से सुलगित,

गत से अनागत तक फैले हुए

संचितसमिधापूर्णसम्पूर्ण तपों की 

समन्वितसमवेतशुभ्रशीलवंत अभिव्यक्ति


उसकी कर्मस्थ कांति,

ललितलोहित कांति

जीवन के अस्ताचल और उदयाचल को

एकजुट बाँधने की कोशिशों में तने हुए आकाश की 

मेहनतकश नसों के पोर-पोर में बह रही थी;

वह मेघों के श्यामल चरित्र में उज्ज्वल अस्मिता भर रही थी,

पर्वत-श्रृंगों के भालों पर गरिमा के 

गहरे गुलाल लपेट रही थी।


किसी कर्मकार की शुभ्रपवित्र,

नीलनीरव रचना 

सभी झंकारों के साथ भी

अशब्द बैठी थीलेटी थी,

कोई अलौकिक सृष्टि-बोध समेटी थी। 


लगा कि पूरे आकाश के शरीर पर

एक मग्न धनुष बैठा है

जो अपनी विधाअपनी विभा को 

निबाहते हुएसँभालते हुए

अपने सीने पर कर्म-वाणों को तानते हुए भी

नैसर्गिक रूप से झुका है। 


अचानकअनायास मेरी आँखें नम हो गईं,

सीने में एक चौड़ी गर्मी बैठ गई।

इस सशब्द संयोग को,

इस बोधइस अबोध को,

इस असाध्य सूनेपन को

मैनें अनजाने ही अपना प्रणाम अर्पित किया!


थोड़ी ही देर में,

सृष्टि के अपठनीय आदेश से 

चारों ओर काली पटीकाली नभ-पटी,

काली कालनभपटी उतर गई।

लगा कि 

यह अमा हैयह  + माँ  है -

जीवन की ऐसी संधि,

उसका ऐसा समास

जहाँ माँ नहीं है

यह अमा है + माँ है

  • सतीश

Oklahoma City, OK. 






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