नारी तुम
नारी, तुम!
तुम हो अमिट, अडोल धुरी,
जीवन-योग की कथा मनोहर,
युग-युगों की अमूल्य थाती,
माँ, बेटी, पत्नी, बहन, सखा, सहचर!
तुम हो जीवन की पहली शिक्षिका,
स्वयं सृजन, सृजन-कर्म की प्रथम शिक्षा!
तुम हो सृष्टि की संजीवनी प्रेरणा,
व्यवस्थाओं, संस्थाओं की दृढ़, मानक नींव,
स्वप्नों, कल्पनाओं, संभावनाओं की अपरिमेय देह,
परम्परा और आधुनिकता की संयुक्त दिव्य दृष्टि,
जीवन-कर्मों की वृहत्, गूढ़, सुंदर आयाम-छवि!
तुम हो प्रकृति, सचेतन शक्ति!
काल, समय की छुअन से परे
चेतन संवेगों से सतत् गतिमान
सभ्यता-संस्कृति की शील-कृति!
-सतीश
Jan 27, 2023.
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