इसे मैं क्या कहूँ?
कभी कुंचित, कभी अकुंचित,
कभी मन-वेणी, कभी मन-मुक्त
इन कच-केशों को मैं क्या कहूँ? -
कचनार कहूँ या कोई कशिश कहूँ?
या इसे, महज़, एक उलझन कहूँ?
या, जीवन-सौंदर्य का,
सौंदर्य के संवेगों का
एक सुरभित, सवाक्, समग्र संचय कहूँ?
इसे मैं क्या कहूँ?
कभी सीधे, कभी तिरछे,
कभी कसे, कभी ढ़ीले
नयनों के घुमावों को मैं क्या कहूँ? -
रोक-टोक कहूँ?
या, एक सरल तरलता में
ऊभ-चुभ करती जीवन-नौका का
सुंदर बहाव कहूँ?
इसे मैं क्या कहूँ?
कभी सिकुड़ती, कभी फैलती
उसकी भृकुटी को मैं क्या कहूँ? -
रस्साकशी-मया कहूँ?
या सृष्टि-भाल को सँभाले
किसी क्षितिज की सुंदर ज्या कहूँ?
हल्की, पतली, नुकीली पुतलियों को मैं क्या कहूँ?
मनधार कहूँ ?
या जीवन-सौंदर्य के आर-पार का
वरण करता हुआ आवरण कहूँ?
इसे मैं क्या कहूँ?
अर्धवृत्तों-से उसके ओठों को मैं क्या कहूँ?
आसमान के चेहरे पर
अर्धचाँद का आलोकित अंकन कहूँ?
या, अपनी सुंदरता की अनुभूति से झुकी हुई
मेपल की हल्की, नुकीली, पतली, लाल-लाल पत्तियाँ कहूँ?
उसके अधर-पट पर लेटी हुई
लीक-लकीरों को मैं क्या कहूँ?
चाँद का मनलेख-रसरेख कहूँ?
या, मेपल की पत्ती की पतली, कोमल नसधार-रसधार कहूँ?
या, विश्व-सृष्टि में
अथ-अनंत से आते, चहकते
चुम्बनों के प्राण-चिन्ह कहूँ?
इसे मैं क्या कहूँ?
कभी सीधी चलती, कभी उभरती-उमगती
उसकी नटखट रेखाओं को मैं क्या कहूँ?
कभी चलता-फिरता, कभी बौराता-बहकता-बहकाता
अंदाज कहूँ?
या, जीवन-चेतना की मोदमय स्फूर्ति कहूँ?
फिर, उधर, उसके वक्षों को मैं क्या कहूँ?
पुलकित जीवन, हर्षित सौंदर्य के
दो प्रसन्न अक्ष कहूँ?
या, इसे सभ्यता और संस्कृति कहूँ?
या, सभ्यता-संस्कृति के दो पूरक पक्ष कहूँ ?
इसे मैं क्या कहूँ?
जीवन के इन सभी सुंदर अवयवों से बनी
एक महती रचना को मैं क्या कहूँ?
जीवन के सौंदर्य में,
जीवन के सृजन में,
जीवन के सौंदर्य-सृजन में लिप्त
एक रत कहूँ या औरत कहूँ?
इसे मैं क्या कहूँ?
एक तरफ़ यह सबकुछ था,
दूसरी ओर शुभ्र प्रकृति सुस्पंदित, सुस्मित थी -
जहाँ मुझे लगा कि
चाँद-चाँदनियों की उजली-उजली ऊर्मियों के साथ
हँसती हुई हवाओं को मैं क्या कहूँ?
इन हवाओं की शिराओं में
समायी हुई सनसनाहट-सरसराहट को मैं क्या कहूँ?
इन हवाओं की मन-सोच में
बही हुई सुगबुगाहट-थपथपाहट, थपेड़ों को मैं क्या कहूँ?
एक शरारत कहूँ या सुरूर कहूँ?
या, किसी मधुमय संगीत का मुदित, शोख़ शरीर कहूँ?
निश्चिंत आसमान के फैले हुए वदन से,
उसके नीले-नीले वसन-व्यसन से
खेलते-मनुहारते, श्यामल-श्यामल
मन-मग्न मेघों को मैं क्या कहूँ?
विनोद-लीन मेघ-कम्पनों को मैं क्या कहूँ?
जीवन की छाती में पसरते हुए
दिल की मुस्कराहट कहूँ ?
किसी प्रसन्न कविता की
एक सुंदर थरथराहट कहूँ?
इसे मैं क्या कहूँ?
इसे मैं क्या कहूँ?
सतीश
25 Oct, 2018
Oklahoma City, OK.
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