जीवन का सहज प्रेम


भोर का सस्नेह जग जाना, 

दोपहरी का चिलचिलाना,

संध्या का गुलाल-सा हो जाना,

रात का काली अलकों-सा 

प्रकृति के सिरहाने पसर जाना,

जीवन का है सहज प्रेम ! 


वसंत का संत-सत्व, श्रृंगार,

ग्रीष्म की सशरीर उष्णता,  

कटिबंध उज्ज्वलता,

वर्षा की बूँदों की सिहरन, 

हेमंत के भावों का नम हो जाना,

शीत का संशय-ग्रस्त कंपन

जीवन का है सहज प्रेम ! 


नानी-दादी की पुरानी बातें,

माँ की अनंत लार-लोरी,

पत्नी की सचेतन, सवाक् उलझन,

बच्चों की निष्ठुर ज़िद,

जीवन का है सहज प्रेम !


हर पल, हर पग

मनुष्य बनने के प्रयास में होना, 

प्रकृति, जीवन व धर्म का निष्कलुष जीना,

उनकी परस्पर एकता, 

उनका ऐकिक रूप-स्वरूप,

संस्कृति की तुलसी-सी छवि,

मर्यादा के युग-बोध से सिंचित 

सार्थक, सकर्मक भव-भाव,

जीवन का है सहज प्रेम! 


सतीश 

    Feb 14, 2023. 










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