वे कहते हैं, - दीप न जलाओ, वे कहते हैं,- पटाखा न छोड़ो! और, भले-भोले, तुम, यों, “हरा-भरा” हो जाओ! “पर्यावरण” का ऐसा वरण, एक विचित्र आवरण है! यह पर्यावरण का अतिशय प्रेम है? या, हमारे स्व और स्वत्व का, संस्कृति की भाव-भंगिमाओं का, परम्पराओं की निष्ठाओं का, परिपाटियों की अभिव्यक्ति का, धर्म की मान्यताओं का अति परिचित, सुनियोजित हरण है? वे कहते हैं - मत जानो, तुम कौन थे, मत पहचानो, तुम कौन हो, मत सोचो, तुम कौन होगे! वे कहते हैं - अरे भाई, तुम ‘मूल’ नहीं, “क़ाफ़िला” हो; तुम “असभ्य” थे, तुम्हें “सभ्य” बनाने बेचैन, बड़े दिल वाली संस्कृतियाँ आयीं , “मानवता” की पवित्र पोथियाँ ले-लेकर! वे कहते हैं - “धर्म अफ़ीम है”! फिर, व्यग्र होकर हमें बताते-जताते हैं कि एक ‘विशेष धर्म’ ही अफ़ीम है, वह नाहक असम-विषम है! और, वे अशेष रूप से सम, समता के वाहक हैं! वे कहते हैं- “म” से माँ न कहना, भारत माँ तो कभी न कहना! कह सको तो, म से केवल “मार्क्स” कहना...
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