ऊपर उठने की कला

आसमान को छू लेने की धुन में

शून्य में स्वयं को खोजते,

विशाल भुजाएँ फैलाये 

चतुर्दिक दिशाओं को थामे 

सम्पूर्णता की खोज में लीन-तल्लीन,

कहीं माथे पर कुंडों को धारे,

कहीं गोद में झीलों को बसाये,

बड़ी-छोटी कंदराओं, सुघड़ घाटियों को 

अस्तित्व, आयाम देते हुए 

खड़े हैं पर्वत ! 


पर, ऊपर उठकर भी वे हो जाते हैं,

जगह-जगह रूखे-सूखे, ऊबड़-खाबड़, अन्यमनस्क!

कहीं पूर्ण चेतन,  कहीं अतिशय जड़,

कहीं बिलकुल सपाट,कहीं बेहद नुकीले! 


सचमुच, अनूठी होती है,

ऊपर उठने की कला,

ऊँचे बने रहने की कला ! 

स्वयं में, स्वत्व में लय,

साकार, सशरीर विस्मय!


-सतीश 

  (Feb 20, 2023)


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