जीवन की छतरी
धरती से दूर सूने में हम बह गये,
कहीं छा गये, कहीं छूट गये,
कहीं ठहर गये, कहीं टूट गये,
कहीं जुड़ गये, कहीं छितर गये,
कहीं फिसल गये, कहीं फहर गये,
कहीं तरल हुए, कहीं तर गये!
अनगिनत भावों की अपरिचित गलियों से
विह्वल-अविह्वल हम गुज़र गये,
गीत-अगीत के अटपटे, सुंदर मनुहारों से
विकल-अविकल, निच्छल भीग गये।
अनमने फ़ासलों को ढँकतीं,
यों ही दूरियों पर छाने के प्रयास में,
कुछ अनोखी, अनजानी आस में
भावनाएँ शून्य में स्वयं को ढूँढती रहीं,
कभी शून्य को थामतीं, यदा-कदा शून्य-सी होती हुईं।
छतरी की अदला-बदली नहीं थी,
उनका बेमेल ठौर भी नहीं था,
सच पूछो तो, कहीं कोई
न नियमन था, न कोई योजन था!
बस, केवल, जीवन का एक लघु, सम्पन्न कथ्य,
मन की छोटी-सी तरल विधा,
एक अन्तर्निहित धारा, एक समाहित भाव,
नियति की अनपहचानी दिशा, एक अद्भुत चय,
कुछ तय, कुछ अ-तय!
-सतीश
(March 11, 2023)
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