हे मन, तू भोर बन!

हर भोर बार-बार कह जाती है -

तू सहज मोद में रह, मद में नहीं;

हर दिन वह जग कर बता जाती है-

सूर्य का अनवरत उजलना, उजलते रहना 

है एक कर्तव्य-धर्म, धर्म-सम्मत क्रिया,

एक आवश्यक, अरोक प्रक्रिया, 

धरती, प्रकृति के प्रति कृपा-दान नहीं! 


यह भी सच है कि

तम का विन्यास चाहे जितना भी सघन हो,

सायास या अनायास आकर 

वह चाहे जितना भी ठहरा-गहरा हो जाये,

वह जीवन की उच्च संज्ञाएँ नहीं बनाता,

चरित्र की कहावत नहीं बनता, संहिता नहीं रचता!


तू विश्वास कर! 


भोर की प्रज्ञा एक बार भोर के हो जाने में नहीं,

हर दिन, हर क्षितिज पर, हर आकाश में 

नये चिंतन, नये मनन् का अवधान कर,

नये ज्ञान, आत्म-ज्ञान का संधान कर

अपने आप को गढ़ने में है, गढ़ते रहने में है,

कर्तव्य के नूतन धवल तूणीरों से 

नये-नये क्षितिज को मँढ़ते रहने में है! 


यही है भोर, यही है भोर की अवधारणा; 

हे मन, तू भोर बन! 


सतीश 

May 13, 2023. 





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बहुत बार

तुम, भोर के विन्यास सी!