जीवन से बड़े होते हैं क्या ?
बड़े से बड़े
अपमान या सम्मान स्वयं
जीवन से बड़े होते हैं क्या?
खुली आँखों के सामने
बुद्धि के चकाचौंध उजियाले में
एक पूरा युग
चुपचाप बीत गया, रीत गया;
समय गाढ़ी निर्ममता के साथ
हम सबों को निठल्ला कर गया,
बेतरतीब, नाचीज़ बनाता चला गया,
हम असहाय, निरुपाय पड़े रहे!
ज़िद की अकड़ गहरी होती गयी,
गाँठें खुलने से डरने लगीं,
मान टूटते रहे, चित्र बिखरते रहे,
छोटे होते गये हमारे मानचित्र!
अपमान और सम्मान के तौल-तराज़ू पर चढ़कर
हम मनुष्य बनने से हिचकते रहे!
अपने-अपने घरौंदे में,अपने-अपने दलानों पर,
चौरों में, चौराहों पर हम अपनी
कुंठाओं का व्यूह बनाते रह गये,
अपनी-अपनी स्वघाती प्रतिज्ञाओं के खूँटे में
आचार-विचार को, सत्य-सही को
निरीह बाँधते चले गये।
फिर, मूलत:, जीवन जीवन ही नहीं रहा,
भीतर-ही-भीतर धुरी हिल गयी,
जीवन हमारा ही नहीं रहा,
अंतत:, जीवन ही नहीं रहा!
हम जीवन को जीवन तो होने दें!
सम्मान या अपमान जीवन से बड़े हो सकते हैं क्या?
-सतीश
Feb 25, 2023.
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