बाली

जहाँ पहुँच कर लगता है कि 

धर्म को धर्म होने में कोई हिचक नहीं,

कोई संकोच नहींचिंता की दबोच नहीं

वृथा व्यथा नहींकोई अनुचित आग्रह नहीं!


उपस्थित है धर्म का “पूरा तन” सनातन-पुरातन भाव से,

फैली हैं संस्कृति की लहरें क्षीर-भाव से उठ-उठ कर


विराजमान रहते हैं छोटे-बड़े मंदिरों के द्वार पर बड़े-वरिष्ठ!

सचमुचपूजा के अन्तस् तक

देवी-देवताओं के आशीष तक

पहुँचने की राहें उनसे होकर जाती हैं


चतुर्दिक

विभिन्न प्रजातियों के बड़े-बड़े पेड़ भी 

परस्पर खींचा-तानी में खोये नहीं हैं,

उनमें कोई व्यग्र आपाधापी नहीं है,

प्रकृति सम होने में मग्न दिखती है,

सुंदरता सहज भाव से और सुंदर होने की धुन में है


-सतीश 

Jul 13, 2023. 

बालीइंडोनेशिया 

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