मन पूछ ही लेता है
न जाने क्यों मन पूछ ही लेता है,
सूरज को भी दीये की,
इतने दीयों की
आवश्यकता क्यों हो जाती है?
अन्यमनस्क हो, या आत्म-मुग्ध हो
फूलों का बरसना, बरसाना
समय को याद रह जायेगा,
इतिहास के ह्रदय में वह काँटों से अधिक चुभेगा!
ये फूल जब यहाँ-वहाँ यों बरसा दिये जाते हैं,
उनके सौंदर्य कुछ खो से जाते हैं,
वे मन को सहज लुभाते नहीं, भाते नहीं!
वे मर्म नहीं जगाते,
कोई कर्म-धर्म नहीं जगाते!
सूरज अँधेरे से होड़ में क्यों है?
फूल को शूल बनने की आवश्यकता क्या है?
मन पूछ ही लेता है!
- सतीश
Sept 16, 2023
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें