चाँद, तुम अकेले !

चाँद, 

तेरे अन्तर्मन में न जाने कितने-कितने दीप जले हैं!

काले-से-काले बादल भी तुझको छू लेने को आकुल हैं,

सच पूछो, तो, वे तुझको बहुविध ढँक लेने को आतुर हैं! 


तुम अकेले, वे असंख्य ! 

विधि का यही लेखा-जोखा !


देखो, चारों ओर

मन-तन से टूटे-टूटे मेघ-खंड भी

किसी भाँति युक्त-संयुक्त होने की भंगिमा लिए 

पूरे आसमान में मदिर भाव से मँडलाते हैं! 


पर, तुम रहे सदा एकचित्त, एकाग्र,

सभी रवों के बीच नीरवता को साधे! 

चाँदनी को धमनियों में बसाये

अँधेरों की अस्मिता को अशब्द ललकारते हुए! 


रात के बीचों-बीच 

तम के साकार विकारों से जूझते 

तुम अकेले, वे असंख्य! 

विधि का यही लेखा-जोखा! 


-सतीश 

Sep 30, 2023. 






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