स्वप्न के मन-द्वार
स्वप्न के मन-द्वार
भले ही,
राहें रूक जाती हैं किसी ओट में,
आँखें थम जाती हैं कहीं सहम कर,
साँसें उद्विग्न हो जाती हैं यहाँ-वहाँ,
पर, स्वप्नों के मन-द्वार खुले के खुले हैं!
वे बताते रहते हैं -
आसमान के रास्ते आसान नहीं होते,
कई बार, वे कबूतरों के नहीं, गरूड़ के होते हैं!
हाँ, कुछ स्वप्न अनवरत पूछते रहते हैं -
किस यज्ञ का हवन बनूँ मैं?
किन वादों, यादों का ध्यान धरूँ?
किन समुद्रों का मन्थन करूँ?
किन मर्यादाओं को नमन करूँ?
किस शक्ति का वरण करूँ मैं?
किन ईश-चरणों को गहूँ मैं?
- सतीश
May 11, 2023
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