युद्ध-प्रश्न
युद्ध के प्रश्न सीधे नहीं होते,
वे छोटे या सरल तो कभी नहीं होते।
युद्ध के पहले या बाद या युद्ध-काल में
सचेतन आत्मा रोती ही है;
रक्त इधर गिरे, या उधर
मानवीय आत्मा छोटी होती ही है।
पर, कई बार युद्ध हम पर थोप दिया जाता है,
वह हमारे दरवाज़े पर निष्ठुर, निर्मम खड़ा रहता है,
तब उससे मुँह मोड़
पिघलने को बेचैन मोममयी शांति की बत्ती जलाना
अकर्मण्य हो जाना है, एक सवाक् पलायन है।
बहुतेरे युद्ध क्या हमें उन्हें चुनने या नहीं चुनने का अवसर देते हैं?
फिर, युद्ध के मैदान में अश्रु-ग्रस्त होना,
शांति के सुंदर, मोहक छंदों को पढ़ना,
आदर्श से भरी संवेदनाओं से अतिशय पीड़ित होना
है कर्म से विमुख होना,
समाज और विश्व के कल्याण-भाव को अस्त-व्यस्त करना!
मानवता को पराजित करना!!
दुःख कहो या दुर्भाग्य, मनुष्यता की कहानी
बार-बार अटक जाती है प्रश्नों के इस भँवर में,
भिन्न-भिन्न निष्ठा और नियत के साथ
एक बेसुध नियति की टेक पर।
-सतीश
Oct 21, 2023
सप्तमी, दुर्गा पूजा
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