मैं तेरी लौ सा जला करूँ

ऐ दीया,

अपने मनोदेश की खुली भूमि पर बैठकर,

सृजन-बाती पर चढ़-चढ़ कर,

पूरे जग में लहक-लहक कर,

मैं तेरी लौ-सा जला करूँ! 


कठोर कलुष और छलपूर्ण तिमिर की

छाती में घुस-घुस कर,

मर्यादा-माटी पर टिक-टिक कर

भोले भावों की भाषा में

मैं तेरी लौ-सा जला करूँ! 


नकारों-धिक्कारों-तिरस्कारों की 

हवाओं में हिल-डुल कर भी

कर्म-धर्म के शील-संवेग,

उष्मा-ऊर्जा से लिपट-लिपट कर

मैं तेरी लौ-सा जला करूँ! 


अपने घर में ही निर्वासित होकर,

सदियों का संताप पीकर

जब भगवान श्रीराम वापस घर लौटे,

तब, अयोध्या के घर-घर में बैठी दीप-कांति!

ऐ दीया, ऐ दीप-कांति,

मैं तेरी लौ-सा जला करूँ!


सतीश 

दीपावली, 2020. 

(13 Nov)


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