मानचित्र

मानचित्र 

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जीवन का मानचित्र कैसा हो? 

सजा-धजा, सुघड़, सुडौल, 

या कुछ अल्हड़, अनगढ़, कुछ बेडौल? 


और मानचित्र की भंगिमा कैसी हो? 

जो भूलों-भटकनों की गिनती नहीं करती,

स्वप्नों के बनने-बिगड़ने के आँकड़े नहीं रखती,

राहों के ऊबड़-खाबड़ होने की चिंता नहीं करती;

जो कभी अन्यमनस्क होती, कुछ अनबुझ होती,

कभी कुछ खोयी होती, कुछ अनदिख होती,

या फिर कभी स्पष्ट प्राप्ति सी प्रत्यक्ष होती! 


मानचित्र की भाव-दशा कैसी हो? 

अनागत संभावनाओं की प्रथाओं, कथाओं से भरी,

ठेसों, ठोकरों, चोटों, कचोटों से प्रेरित होती,

प्रहारों, हारों से उमगती, उत्सुक, उत्फुल्ल होती! 


मानचित्र की मर्म-भावना कैसी हो? 

जीवन की अनपढ़ रेखाओं को उकेरती कला सी,

बार-बार अपने को ढूँढती जिज्ञासा सी,

अनवरत स्वयं से उलझती पहेली सी,

असंतुलन से जन्म लेती अनमोल जीवन-निधि सी, 

अपनी सीमाओं को कर्म-धर्म के अनहद नाद से भरती

हर विस्तार को चुनौती देती चौहद्दी सी! 


जीवन का मानचित्र कैसा हो? 

मानचित्र की भंगिमा कैसी हो? 

उसकी भाव-दशा, मर्म-भावना कैसी हो? 


-सतीश 

मार्च 9, 2024.

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