वल्लरी
वल्लरी
कितनी सहज होती है वल्लरी!
लिपट जाती है औरों से भी,
तन से, मन से,
जीवन से, जीवन-भर!
सुबह हो या शाम उसे अंतर नहीं आता,
वह स्वयं से बात करती रहती है,
दूसरों के संग रहकर भी
साँसों को साँसों से सुलगाती
अपनी धुन में रहती है!
वह पुस्तकों में, वादों, विवादों में,
तर्कों, अंकों, आँकड़ो की रेतीली छवियों में
अपने आप को खोती नहीं,
हर क्षण जीवन को ढूँढने में लगी रहती है;
कभी किसी कोने में, कभी बहुतों के बीच,
कभी फूलों के साथ, कभी काँटों के संग
जीवन के प्रसंगों को खोजती,
जीने में जुटी रहती है !
ये वल्लरी!
-सतीश
अगस्त 1, 2024.
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