मुख्यमंत्री प्रदर्शन पर हैं!
मुख्यमंत्री प्रदर्शन पर हैं!
समाचार ने बताया कि
अपने ही राज्य में
बलात्कार के विरूद्ध “मुख्यमंत्री” प्रदर्शन पर हैं!
यह “सम-आचार” है
या व्यवस्था का विषम आचार?
या एक सुनियोजित व्यभिचार?
या मान-मानकों के वधिकों का कुत्सित संस्कार?
या क्रियाहीनता का वीभत्स चरित्र?
या कार्यपालिका की कर्म-विहीन अश्लीलता?
कहते हैं इसे
प्रजातंत्र के बेचैन ह्रदय की अनोखी ममता?
या प्रजातंत्र का अद्भुत जंतर-मंतर?
या जंतर-मंतर का शांतिप्रिय दर्शन ? !
या मर्यादा-मही का महाभंजन?
दूसरे प्रदेश के निष्ठावान नेता ने
अपनी निष्ठा-विष्ठा को मन से उलीच दिया
और ज़ोर देकर जताया कि
मुख्यमंत्री “महिला” हैं, वह “संवेदनशील” हैं!
सचमुच, प्रजातंत्र की आत्मा सात्विकता से हिल गई,
“बंग-भंग” पर पूरी-पूरी ममतामयी हो गई,
एक “समाजी”, एक “वादी” की “संवेदना” के
“शील” के धर्म से निरपेक्ष स्पंदन से!
फिर खबर आई कि
बलात्कार के घटना-स्थल पर पेशाबघर बना दिये गये!
प्रजातंत्र ने यों मर्यादित होकर
अपने मल-मूत्र के सुत्याग की मान्य विधि खोज ली!
ओ भारत-भाग्य-विधाता !
व्यवस्था की महती वधिक-विधा का तुझसे ये अटूट नाता!
तृण-अतृण, मूल-समूल-अमूल-कुमूल!
-सतीश
अगस्त 18, 2024.
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