सागर का जीवन
सागर का जीवन
ऐ सागर, तेरा विस्तार!
तेरे अस्तित्व के तार-तार,
हम कह लें इसे गति का नैसर्गिक शील या जड़ता!
अनगिनत लहरें तेरी छाती पर लोटती रहीं,
लोग पहेलियों की तरह आये और चले गये,
सदियाँ सामने से गुज़र गईं,
कई बार समय की ज़ुबानी थम सी गई,
बहुत बार साँसों की कहानी सचेतन हो गई,
शहर भाग-दौड़ में अब भी व्यस्त है,
घाटियाँ लहलहा रही हैं,
उसके तन-मन पर हरे-भरे पेड़ सवाक् उठे हैं!
पर, महासमुद्र, तुम इतने चुप क्यों हो?
तेरा मन इतना अचंचल कैसे है?
किस स्मृति में तुम खोये हो?
कौन-सा रहस्य मन में धारे हो?
असीमित रूप से फैल कर भी
शून्यता को बूझने में लीन हो?
यही जीवन है?
यही जीवन है!
-सतीश
अगस्त 24, 2024.
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