कविता का बनना, नहीं बनना
कविता का बनना, नहीं बनना
कविता के बनने की प्रकिया,
उसका बनते बनते रह जाना कविता है!
जीवन को पाना,
कहीं जीवन का अटक जाना कविता है।
अपने आप को पा लेना,
या कभी नहीं पा पाना,
या पाते-पाते बहुत सारे भावों का छूट जाना कविता है।
अपने आप को ढूँढ़ना,
ढूँढने से हिचकना,
उस हिचक को पहचानना,
स्वयं से नेह-मोह, कभी विरोध,
कभी विद्रोह कविता है।
अपने छोटापन को देखना,
उससे जूझना, उस यात्रा में
सफल या असफल होना कविता है!
जीवन की आवश्यक-अनावश्यक आपाधापी में
कुछ चीजों का बचा रह जाना,
बचे रहने का योग, संयोग
और साथ ही कुछ तत्वों का कहीं छूट जाना कविता है!
-सतीश
3 अगस्त/ 31 अगस्त 2024.
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