सागर-शरीर
सागर-शरीर
सागर, तेरे शरीर पर हमने
तरल भावों को सहज सरकते देखा;
सागर, तेरी लहरों में हमने
जीवन को उठते-गिरते देखा;
सागर, तेरी छाती में हमने
उन्मादी साँसों को मदमाते देखा;
सागर, तेरे वक्ष-पटल पर हमने
शून्य को कुछ ऊभ-चुभ करते देखा;
सागर, तेरी नील-नील छवि में हमने
सौंदर्य को समाधि लेते देखा;
सागर, तेरे अन्तर्मन में हमने
वर्षों-सदियों-कल्पों को बोलते-सुनते देखा;
सागर, तेरे गर्जन-तर्जन में
उत्सुकता, उम्मीदों, मूड-मिज़ाजों को हहराते देखा;
सागर, तेरे तट पर हमने
जीवन-रेतों को तन-मन से भीगा देखा;
सूखी-भूखी सत्ता को चाहे-अनचाहे
कुछ विभोर होते, कुछ डूबते देखा!
-सतीश
अगस्त 24/25, 2024.
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